अपनी नज़रों से मरहम लगाओगे क्या
घाव गहरा है इसको सुखाओगे क्या
दोस्ती दिल्लगी या मुहब्बत कहूँ
जो भी है आप इसको निभाओगे क्या
मेरे दिल में तो घर कर गए तुम सनम
अपने दिल में मुझे भी बसाओगे क्या
तुम तो नज़रे झुका कर के यूँँ चल दिए
इतना शरमा के उल्फ़त निभाओगे क्या
वार कजरारे नैनों के भारी पड़े
ज़ख़्म नासूर हैं ये मिटाओगे क्या
आपके दिल में इतनी चकाचौंध है
कुछ अँधेरे इधर भी घटाओगे क्या
माँ की अर्थी में तक आप आए नहीं
दे के काँधा मुझे फिर उठाओगे क्या
रू-ब-रू हो चुका हूँ कई मौतों से
ज़िंदगी से भी मुझको मिलाओगे क्या
जबसे 'उपमन्यु' हमने कहा अलविदा
लोग कहने लगे दिल लगाओगे क्या
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