मैं तुझ सेे रूठ जाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
नहीं उल्फ़त निभाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
तेरी गलियों में मेरी रहगुज़र की दम से रौनक़ है
इन्हें सूना बनाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
वफ़ाऍं तूने की हैं मुझ सेे होगा उनका कुछ तो मोल
नहीं उसको चुकाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
तस्व्वुर में ही जब तेरे सिवा बसता नहीं कोई
तो इस-उस दर पे जाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
मुहब्बत है मुझे तुझ सेे तो तुझको भी तो है मुझ सेे
भला फिर दूर जाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
पपीहे की तरह निशिदिन मैं तेरा नाम रटता हूँ
न तुझको याद आऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
तेरा उपमन्यु बड़भागी कि तू मेरा हुआ कान्हा
मैं इस-उस का कहाऊँ तो तुझे अच्छा लगेगा क्या
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