फ़ितरत का बाब-ए-हुस्न में ऐसा भी सीन है
जो जितना बदमिजाज़ है उतना हसीन है
इक रौशनी का शहर है उस दिलरुबा का जिस्म
जिस
में हमारी तीरगी गोशा-नशीन है
बदनाम तेरे ग़म से हूँ और है इसी से नाम
मेरे लिए ये साँप मेरी आस्तीन है
मेरा वही सवाल है दो वक़्त की खुराक़
तुझको कोई असार है कोई अमीन है
मेरे लिए वो लफ़्ज़-ए-मुक़द्दस है बस यक़ीन
वो ही जो तेरे वास्ते कुछ दीन-वीन है
कद्दावरी ये दिल पे मेरी जाइएगा मत
हर आसमाँ के पाँव तले इक ज़मीन है
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