तक़दीर पे राज़ी हूँ न तदबीर से ख़ुश हूँ
मैं ख़्वाब-ज़दा कब किसी ताबीर से ख़ुश हूँ
कुछ रोज़ से चलने की रज़ा ही नहीं मुझ
में
कुछ रोज़ से मैं पाँव की ज़ंजीर से ख़ुश हूँ
मैं ख़ुद को बनाने की जुगत ही नहीं करता
जैसी भी है जो है तेरी तामीर से ख़ुश हूँ
मिलने के लिए ख़ुद से निकलना भी तो होगा
ऐ जान-ए-वफ़ा मैं तेरी तस्वीर से ख़ुश हूँ
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Nivesh sahu
our suggestion based on Nivesh sahu
As you were reading Qaid Shayari Shayari