दो दिल वो संग संग धड़कते हैं आज भी
खिड़की से चोरी चोरी वो तकते हैं आज भी
कहता है कौन 'इश्क़ के लहजे बदल गए
कंगन कलाइयों में खनकते हैं आज भी
करता है कोई साज़िशें वर्ना यूँँही नहीं
आँचल घड़ी में इक दो अटकते हैं आज भी
इतनी है पाक 'इश्क़ की ये दास्ताँ सुनो
आने में वो क़रीब झिजकते हैं आज भी
ख़्वाबों से अब तलक तिरी सूरत नहीं गई
उठ उठ के रात-भर को सिसकते हैं आज भी
नीची निगाह उठती है आते ही नूर के
यानी शरीफ़ लोग बहकते हैं आज भी
As you were reading Shayari by Parul Singh "Noor"
our suggestion based on Parul Singh "Noor"
As you were reading undefined Shayari