उम्र आधी इश्क़ की वो यूँँ गवाता रह गया

बे-वफ़ा कह कर मुझे बस आज़माता रह गया

शौक़ से तस्वीर जिस की खींचते रहते थे सब
तीर खा के वो परिंदा फड़फड़ाता रह गया

पूछ डाला जब किसी ने हँसने रोने का सबब
नाम तेरा इन लबों पे आता आता रह गया

दौड़ते थे पीछे कुछ बच्चे ख़्वाबों सा समझ
और साहिब देख कर गाड़ी भगाता रह गया

इक तरफ़ कोई शहर में आ के वापस जा चुका
इक तरफ़ कोई मगर बस घर सजाता रह गया

क्या किया है आज तक ये कह दिया है उस ने आज
बाप जिस बेटे की ख़ातिर बस कमाता रह गया

जा रहा है सामने से हाथ था
में ग़ैर का
और मैं पागल उसे अपना बताता रह गया

सौ दफ़ा बिखरा समेटा होगा दिल को खुद-ब-खुद
चोट खा कर ज़ख़्म पर जो मुस्कुराता रह गया

'नूर' जब सारे शहर को थी निगलती तीरगी
घर मिरा अपने चराग़ों को बचाता रह गया

— Parul Singh "Noor"

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