हज़ारों बार ये नादान दिल बस टूट जाता है
इसी इक आस में के जाने वाला लौट आता है
मिरे ही वास्ते लाया है दोनों फूल और ख़ंजर
मुझे ये देखना है बस वो पहले क्या उठाता है
मुहब्बत की दिनों में तो मुझे वो जान कहता था
बिछड़ कर हिज्र में देखूँ वो क्या कह कर बुलाता है
उसे घर पे सड़क पे कोठों पे बैठा दिया अक्सर
जिसे बातों में अक्सर आदमी देवी बताता है
बता अब हिज्र को भी हो गए दो साल कैसा है
मैं तो बर्बाद ही हूँ ख़ैर तेरा क्या ही जाता है
— Parul Singh "Noor"















