zehn men ik dhun sa aake atka ho | ज़हन में इक धुन सा आके अटका हो

  - Parul Singh "Noor"

ज़हन में इक धुन सा आके अटका हो
जैसे तेरा नाम कोई नग़मा हो

रात में तुझ सेे मिलन के वास्ते
चाँद दिन भर छुप के सब से सजता हो

सोचती हूँ ऐसा हो तो कैसा हो
हाथ था
में सामने वो बैठा हो

क्या कहें उसको क़यामत या क़ज़ा
'इश्क़ जब दोनों तरफ इक तरफा हो

पूछती है दूर घर से माँ मुझे
दोस्त है कोई जो लगता अपना हो

हिज्र का अफ़सोस इतना सा उसे
हाथ मेरे कोई कंगन चटका हो

  - Parul Singh "Noor"

Dosti Shayari

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