ज़ेहन में इक धुन सा आके अटका हो

जैसे तेरा नाम कोई नग़मा हो

रात में तुझ से मिलन के वास्ते
चाँद दिन भर छुप के सब से सजता हो

सोचती हूँ ऐसा हो तो कैसा हो
हाथ था
में सामने वो बैठा हो

क्या कहें उस को क़यामत या क़ज़ा
इश्क़ जब दोनों तरफ़ इक तरफा हो

पूछती है दूर घर से माँ मुझे
दोस्त है कोई जो लगता अपना हो

हिज्र का अफ़सोस इतना सा उसे
हाथ मेरे कोई कंगन चटका हो

— Parul Singh "Noor"

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