हम बिछड़े तो अपने सर इल्ज़ाम ले के रोए
जब कर न सके कुछ तेरा नाम ले के रोए
जब याद किया उसकी मयकश सी निगाहों को
फिर काँपते से हाथों में जाम ले के रोए
ये नस्ल भरी नफरत वाली ये न समझेगी
क्यूँ ज़ख़्मी लखन को गोद में राम ले के रोए
हद याद रहे अच्छा होता है वगरना फिर
ऐसा न हो अपना तू अंजाम ले के रोए
थे कौन जो मर जाते है नामे-वतन ले के
है कौन जो हाथों में पैगाम ले के रोए
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