हमीं ने थी सजाई चाक इश्क़ और ख़्वाब की
हमीं पे आज लग गई है तोहमत अज़ाब की
वो जीत कर भी इश्क़ में चला गया रुका नहीं
मैं हार कर हूँ कर रही नुमाइशें ख़िताब की
यहाँ तुम्हारे जश्न को बना रही बुलंद है
कई घरों को खा गई है बोतलें शराब की
जवाब चाहती थी जो वही फ़क़त मिला नहीं
गुलों में ख़त्म हो चुकी है पत्तियाँ गुलाब की
— Parul Singh "Noor"















