मैं करूँँ आज इश्क़-ए-दिलबर की बातें

या'नी के मौसम-ए-दीदा-ए-तर की बातें

मत यक़ीं कर सियासत के वायदों पर
जानते हैं महल कब खंडर की बातें

रोज़ ढक लेती थी नीला जिस्म अपना
शुक्र है आ गई बाहर घर की बातें

ख़्वाब अपने बताऊँ तो कहता है वो
सहरा में रहते हो और सागर की बातें

मान सम्मान पत्नी का दाव पर है
आज अच्छी नहीं रण में डर की बातें

है अधूरा ज़माना सारा कभी 'नूर'
तो कभी काफी है बस पल भर की बातें

— Parul Singh "Noor"

More by Parul Singh "Noor"

Other ghazal from the same pen

See all from Parul Singh "Noor" →

Badan Shayari

Shers of badan.

All Badan Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling