आए मुश्किल से उस रात का दिन
अगला हो जब मुलाक़ात का दिन
आख़िरी दिन गुज़ारा है हम ने
याद कर के शुरुआत का दिन
है दिवाली का दिन और ऊपर
आ गया बिगड़े हालात का दिन
और कितनी सुनूँ रोज़ तेरी
हो कभी तो मिरी बात का दिन
हिज्र का दिन क़ज़ा मेरी था और
बे-वफ़ा की रिवायात का दिन
— Parul Singh "Noor"















