नस्ल ये जो रब से मिन्नत माँगती है
थोड़ी मेहनत भी तो क़िस्मत माँगती है
चुभती है आज़ादियाँ उस की जहाँ को
जब इक औरत हक़ की दौलत माँगती है
इक वफ़ा दो लफ़्ज़ तेज़ी यार की सी
कुछ ज़ियादा कब मोहब्बत माँगती है
हक़ था बाबा पे ना थी जब तक बियाही
आने को घर अब इजाज़त माँगती है
दिन गए जब रूह का रिश्ता थी चाहत
अब मोहब्बत भी नज़ाकत माँगती है
— Parul Singh "Noor"















