फिरा बन के तमाशाई मिरी ख़ातिर
हक़ीक़त में था हरजाई मिरी ख़ातिर
निकल घर से न देखा मुड़के मैं ने और
दुआ करती रही माई मिरी ख़ातिर
मिरी तो जेब कब से ख़ाली है साहिब
मुहब्बत है महँगाई मिरी ख़ातिर
उदासी मेरे पीछे घर नहीं आती
वहाँ रहता है इक भाई मिरी ख़ातिर
ख़ुदा ने दे दिया सब कुछ ज़माने को
लिखी तो महज़ तन्हाई मिरी ख़ातिर
— Parul Singh "Noor"















