किसी को भी न जब यक़ीन मुझ में था
थी आस अहलियत थी दीन मुझ में था
तुम्हें मिला भी तोड़ने को दिल मिरा
यही तो सब से बेहतरीन मुझ में था
तमाशा बन गई थी ज़िन्दगी मिरी
मैं आख़िरी तमाशबीन मुझ में था
सही सही तो कुछ न कहता था मगर
कहा ये बस कि सब हसीन मुझ में था
— Parul Singh "Noor"















