किसी को भी न जब यकीन मुझ में था
थी आस अहलियत थी दीन मुझ में था
तुम्हे मिला भी तोड़ने को दिल मिरा
यही तो सब सेे बेहतरीन मुझ में था
तमाशा बन गई थी ज़िन्दगी मिरी
मैं आख़िरी तमाशबीन मुझ में था
सही सही तो कुछ न कहता था मगर
कहा ये बस कि सब हसीन मुझ में था
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