मिरी सगी मिरी हयात ही नहीं हुई
तो ख़ुद-कुशी की भी बिसात ही नहीं हुई
कई दिनों से कोई शे'र ही नहीं हुआ
कई दिनों से उस से बात ही नहीं हुई
जो एक दिन मनाने बैठे सोग हिज्र का
कभी उस एक दिन की रात ही नहीं हुई
हमें भी इश्क़ खा गया तबाह भी हुए
ये ज़्यादती तुम्हारे सात ही नहीं हुई
कई गुज़र गई हैं जिन में आना था तुम्हें
तुम्हारे शहर चाँद रात ही नहीं हुई
— Parul Singh "Noor"















