kisi gali mein kiraye pe ghar liya usne | किसी गली में किराए पे घर लिया उसने

  - Umair Najmi

किसी गली में किराए पे घर लिया उसने
फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे

  - Umair Najmi

Ghar Shayari

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As you were reading Shayari by Umair Najmi

    बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूॅं मैं
    वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूॅं मैं

    जिसे दिखाई दूॅं मेरी तरफ़ इशारा करे
    मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूॅं मैं

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    सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूॅं मैं

    किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया
    अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूॅं मैं

    मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ
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    मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत
    जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूॅं मैं
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    बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
    बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है

    ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे
    बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है

    नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक
    मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है

    निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
    अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है

    ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है
    मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है

    ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ दे दूँ
    जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है

    मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार
    मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है
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    Umair Najmi
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    तुमने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं
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    तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो
    सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो

    तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से
    मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो

    किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में
    ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो

    ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा
    दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो

    ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं
    किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो

    हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है
    प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो
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    Umair Najmi
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