आकाश में उड़ता हुआ लश्कर नया मिला
क़ातिल तेरे हाथों में मुझे सर नया मिला
वो दिल यूँँ मेरा तोड़ के है मुतमइन बहुत
मैं भी हूँ बहुत ख़ुश कि मुझे घर नया मिला
वो आँख जिसे नींद न आई हो रात भर
वो दिल कि जिसे ख़्वाब में दिलबर नया मिला
ख़ुशबू से बदन टूटता है आजकल मेरा
मुझ को कि सर-ए-ख़्वाब मुक़द्दर नया मिला
कहते हैं जिसे फ़न कहीं शायद ये वो ही है
काग़ज़ से निकलता हुआ पत्थर नया मिला
ऐ दोस्त ज़रा सोच वो क्या ही कहेंगे शे'र
वो जिन को सर-ए-राह सुख़न-वर नया मिला
चुनती न अगर शा'इरी तो होते तुम कहाँ
राकेश तुम्हें शा'इरी से पर नया मिला
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