मेरी आँखों में हुआ जब से ठिकाना तेरा
लोग कहते हैं सर-ए-आम दिवाना तेरा
रोज़ मिलने की तसल्ली न दिया कर मुझको
जान ले लेगा किसी रोज़ बहाना तेरा
छीन लेगा ये मेरा होश यक़ीनन इक दिन
यूँँ ख़यालों में शब-ओ-रोज़ का आना तेरा
होश वालों को कहीं फिर न बना दे पागल
महफिल-ए-हुस्न में बन-ठन के यूँँ आना तेरा
भूल पाना बड़ा मुश्किल है वो दिलकश मंज़र
मुस्कुरा कर लब-ए-नाज़ुक को दबाना तेरा
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