बस याद रखकर के मिरा शिकवा गिला
तुमने दिया है यारी का अच्छा सिला
माना मैं अब जीना नहीं हूँ चाहता
पर दोस्त मुझको ज़हर तो तू मत खिला
जो ज़िन्दगी में ख़ास होता है बहुत
वो शख़्स मुझको ऐसा-वैसा ही मिला
मैंने किया स्वीकार हर इक शख़्स को
जो भी मिला जैसा मिला जितना मिला
टूटा है दिल तो तू मुझे दारू नहीं
ऐ दोस्त! मुझको नीम का काढ़ा पिला
साहिल, तू उसको माफ़ करना बाद में
एहसास ग़लती का उसे पहले दिला
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