बस याद रख कर के मिरा शिकवा गिला

तुम ने दिया है यारी का अच्छा सिला

माना मैं अब जीना नहीं हूँ चाहता
पर दोस्त मुझ को ज़हर तो तू मत खिला

जो ज़िन्दगी में ख़ास होता है बहुत
वो शख़्स मुझ को ऐसा-वैसा ही मिला

मैं ने किया स्वीकार हर इक शख़्स को
जो भी मिला जैसा मिला जितना मिला

टूटा है दिल तो तू मुझे दारू नहीं
ऐ दोस्त! मुझ को नीम का काढ़ा पिला

साहिल, तू उस को माफ़ करना बा'द में
एहसास ग़लती का उसे पहले दिला

— Sahil Verma

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