ज़िन्दा होते हैं रोज़ मरते हैं
लोग पागल हैं 'इश्क़ करते हैं
हमको कहनी है उन सेे बात वही
बात कहते सभी जो डरते हैं
और डरते नहीं किसी शय से
उनकी नाराज़गी से डरते हैं
गुफ़्तगू उन सेे कैसे की जाए
बात करते हैं फूल झड़ते हैं
डर ख़ुदास ज़रा नहीं लगता
हिज्र की वहशतों से डरते हैं
रोज़ करते हैं वस्ल के वादे
रोज़ वादे से वो मुकरते हैं
साफ़ कहते हैं बात हम फिर भी
आँखों में आपकी अखरते हैं
As you were reading Shayari by Shadan Ahsan Marehrvi
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