दरमियाँ फ़ासला नहीं होता
तू अगर बेवफ़ा नहीं होता
साफ़ कहना बुरा नहीं होता
मुझ को फिर वसवसा नहीं होता
तुम न आते अगर गुलिस्ताँ में
कोई भी गुल खिला नहीं होता
ज़र्रे ज़र्रे में है ख़ुदा पिन्हा
कोई ज़र्रा ख़ुदा नहीं होता
सच तो ये है कभी बुराई से
आदमी का भला नहीं होता
उन किताबों को हम नहीं पढ़ते
जिन
में ज़िक्र आपका नहीं होता
मुद्दई 'इश्क़ मर भी जाए तो
'इश्क़ का खात्मा नहीं होता
मुद्दतों शख़्स जो रहा मुझ में
उस सेे अब राब्ता नहीं होता
तेरे कूचे से जब गुज़रता हूँ
मुझको अपना पता नहीं होता
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