बिगड़ी हुई इस शहर की हालत भी बहुत है
जाऊँ भी कहाँ इस से मोहब्बत भी बहुत है
बस एक क़दम का है सफ़र मंज़िल-ए-मक़्सूद
रुक जाए तो इतनी सी मुसाफ़त भी बहुत है
क्या माँगते हो अपनी दु'आओं में शब-ओ-रोज़
सोचो तो शब-ओ-रोज़ की दौलत भी बहुत है
मुश्किल है बहुत जादा-ओ-मंज़िल का तअ'य्युन
और मुझ को भटक जाने की आदत भी बहुत है
मैं आँख से टपके हुए एक अश्क की मानिंद
बे-माया भी हूँ और मेरी क़ीमत भी बहुत है
काफ़ी है शब-ए-ग़म के लिए एक दिया भी
इस दौर में छोटी सी सदाक़त भी बहुत है
वो शख़्स जो गुज़रा है अभी आँख बचाकर
'शहज़ाद' उसे मेरी ज़रूरत भी बहुत है
— Shahzad Ahmad















