सुन कर किया है अनसुना औरत के दर्द को
कोई नहीं समझ सका औरत के दर्द को
मर्दों ने हँसना बोलना सीखा इन्हीं से और
ता-उम्र समझा क़हक़हा औरत के दर्द को
मज़लूम अपने हक़ के लिए भी न लड़ सकी
हर आदमी दबा रहा औरत के दर्द को
हम ने इबादतों में बताया तो था मगर
रब भी नहीं समझ सका औरत के दर्द को
रफ़्तार-ए-ज़िंदगी ने किया सब इधर उधर
क्यूँँ वक़्त कम न कर रहा औरत के दर्द को
छोटा सा ज़ख़्म बन गया नासूर एक दिन
जब वक़्त पर नहीं सुना औरत के दर्द को
औरत का दर्द जाइए औरत से पूछिए
अब मर्द से न पूछना औरत के दर्द को
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