हमारी आँखों का काजल बहा कर
जो आया वो गया दिल को दुखा कर
हमारी कौन सुनता चल दिए सब
हमें तकलीफ़ फिर अपनी सुना कर
वो पंछी फिर दोबारा उड़ न पाए
किए आज़ाद जो क़ैदी बना कर
ख़ुशी बाँटो ख़ुशी से और सोचो
किसी को क्या मिला है दिल दुखा कर
अगर मुजरिम हो तो फिर जुर्म अपना
करो मंज़ूर अब सर को झुका कर
हमारी आँखें तो तकती रहीं पर
नहीं देखा किसी ने दूर जा कर
चलो भरते हैं ख़ालीपन ये शम्पा
दर-ओ-दीवार को बातें सुना कर
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