चलो माना कि तुग़्यानी नहीं थी
मगर सहरा में आसानी नहीं थी
सुपर्द-ए-ख़ाक होता जा रहा हूँ
मेरी कोई निगहबानी नहीं थी
मोहब्बत मौत का है इक वसीला
यहाँ जीने में इम्कानी नहीं थी
शगुफ़्ता फूल कुचले जा रहे थे
कभी मरने में आसानी नहीं थी
दिलों को तोड़ना पेशा था उसका
उसे कोई पशेमानी नहीं थी
बिछड़ने की वजह उसने बताई
मोहब्बत ये फ़रावानी नहीं थी
दुखाया दिल नहीं हमने किसी का
किसी की बात भी मानी नहीं थी
बिछड़ते वक़्त मुझको याद आया
तेरी आँखों में तुग़्यानी नहीं थी
As you were reading Shayari by Shamsul Hasan ShamS
our suggestion based on Shamsul Hasan ShamS
As you were reading undefined Shayari