पता है आश्ना दुनिया है तुम से
मगर मेरा भी कुछ रिश्ता है तुम से
नमी सी आँख में रहती है हर दम
ये सहरा आज भी दरिया है तुम से
निगाहों से कभी ओझल न होना
कोई अपनी ख़बर रखता है तुम से
बहुत मक़्बूल हैं कुछ झूट मेरे
उन्हीं में एक वाबस्ता है तुम से
कहो लब से अगर इनकार भी है
मुझे शायद यही सुनना है तुम से
ज़रा सा प्यार ही तो चाहता हूँ
बताओ और क्या झगड़ा है तुम से
भरोसा उठ गया लफ़्ज़ों से मेरा
मुझे अब कुछ नहीं कहना है तुम से
— Shariq Kaifi















