हंसते हंसते खामखाह ही पुराने ज़ख्म उभर आए
खुशियां इतनी हो गई कि आँखों में अश्क भर आए
ना जाने ये कौन शख़्स है जो आइने से घूरता है हमें
हमारे ग़मों पर ना जाने क्यूँ रक्स करता नजर आए
मंज़िल को पलकों पर बिठाए इक अरसे से चले जा रहे
मंज़िल को जाने वाली, हर राह से हम गुज़र आए
तमन्नाएं, उम्मीदें, ख्वाहिशें सब धुंधली पड़ने लगी हैं
मिल जाए जो मंज़िल, लौटकर हम सुकूं से घर आए
ये जो बुरा वक़्त है, कमबख्त गुजरता ही नहीं "निहार"
इंतज़ार में अच्छे वक़्त के, हम और भी निखर आए
Read Full