meri saansen ab jo hichkiyon men kahii atak raheen hain | मेरी सांसें अब जो हिचकियों में कहीं अटक रहीं हैं

  - Shashank Tripathi

मेरी सांसें अब जो हिचकियों में कहीं अटक रहीं हैं
कि निगाहें उसे देखने को अब दर दर भटक रहीं हैं

उसकी इक तस्वीर है जो मुझे चैन-ओ-सूकूं देती है
उसके ज़ुल्फ़ों की लटें जिस
में चेहरे पर लटक रहीं हैं

जाते जाते वो मुझ सेे इस कदर लिपटी थी इक रोज़
कि उसकी खुशबू मेरे बदन से आज भी महक रही है

कभी जो लगती थी प्यारी हदस ज्यादा उसे
मेरी वो तमाम बातें अब उसको खटक रहीं हैं

गर वो खुश है मुझ सेे दूर, उसकी खुशियां सिर आँखों पर
मगर ये धड़कनें हैं जो बस उसके नाम से ही धड़क रहीं हैं

सुना है हिचकियों में याद की तासीर होती है "निहार"
मिलन की जो बेचैनियां हैं, वो ग़ज़लों में झलक रहीं हैं

  - Shashank Tripathi

Yaad Shayari

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