nazar se door rahe ya nazar ke paas rahe | नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे

  - Siraj Faisal Khan

नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे
हमेशा इश्क़ के मौसम बहुत ही ख़ास रहे

मैं तेरे ज़िक्र की वादी में सैर करता रहूँ
हमेशा लब पे तिरे नाम की मिठास रहे

ये इज़्तिराब जुनूँ को बहुत अखरता है
कि तुम क़रीब हो तन पर कोई लिबास रहे

वो रू-ब-रू थे तो आँखों से दौर चल निकले
खुली न बोतलें ख़ाली सभी गिलास रहे

ये बात राज़ की दादी ने हम को बतलाई
हमारी उम्र में अब्बा भी देवदास रहे

मैं कहकशाओं में ख़ुशियाँ तलाशने निकला
मिरे सितारे मिरा चाँद सब उदास रहे

मैं मुंतज़र हूँ किसी ऐसे वस्ल का जिस में
मिरे बदन पे तिरे जिस्म का लिबास रहे

तिरी हयात से जुड़ जाऊँ वाक़िआ' बन कर
तिरी किताब में मेरा भी इकतिसाब रहे

  - Siraj Faisal Khan

Kashmir Shayari

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