जो गुज़ारा है अगर वो भी नहीं बोलूँगा
तो बता दर्द की कैसे ये गिरह खोलूँगा
ये परिंदे ये शजर बाँट रहे दुख अपना
सोचता हूँ कि ज़रा देर कभी सो लूँगा
मेरे पहलू में मिरी ज़िंदगी बैठी है अभी
सब्र रख मौत तिरे साथ में भी हो लूँगा
फिर किसी रोज़ कोई लूट के ले जाएगा
फिर किसी रोज़ बहुत देर से मैं बोलूँगा
ये जो दीवार-ए-बदन पर हैं लहू के छींटे
इस से पहले कोई देखे मैं इन्हें धो लूँगा
याद आतें हैं बहुत लोग मुझे रातों को
याद जब कोई नहीं आएगा तो सो लूँगा
तेरा ग़म बाँटना है मुझ को गले से लग जा
अपनी तकलीफ़ पे आराम से मैं रो लूँगा
जैसे ख़ामोश हूँ आगे भी रहूँगा ख़ामोश
कोई बोलेगा मुझे कुछ मैं तभी बोलूँगा
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