jo guzaara hai agar vo bhi nahin boloonunga | जो गुज़ारा है अगर वो भी नहीं बोलूँगा

  - Sohil Barelvi

जो गुज़ारा है अगर वो भी नहीं बोलूँगा
तो बता दर्द की कैसे ये गिरह खोलूँगा

ये परिंदे ये शजर बाँट रहे दुख अपना
सोचता हूँ कि ज़रा देर कभी सो लूँगा

मेरे पहलू में मिरी ज़िंदगी बैठी है अभी
सब्र रख मौत तिरे साथ में भी हो लूँगा

फिर किसी रोज़ कोई लूट के ले जाएगा
फिर किसी रोज़ बहुत देर से मैं बोलूँगा

ये जो दीवार-ए-बदन पर हैं लहू के छींटे
इस से पहले कोई देखे मैं इन्हें धो लूँगा

याद आतें हैं बहुत लोग मुझे रातों को
याद जब कोई नहीं आएगा तो सो लूँगा

तेरा ग़म बाँटना है मुझ को गले से लग जा
अपनी तकलीफ़ पे आराम से मैं रो लूँगा

जैसे ख़ामोश हूँ आगे भी रहूँगा ख़ामोश
कोई बोलेगा मुझे कुछ मैं तभी बोलूँगा

  - Sohil Barelvi

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