किस की नज़र से उतरे किसे भा रहे हैं हम
अपने किए पे आज भी पछता रहे हैं हम
होठों से अपने चूम के तुम जिस में रख गए
कुछ दिन से उस किताब में मुरझा रहे हैं हम
मतलब के इस जहान में अपना कोई तो है
दिल को इसी ख़याल से बहला रहे हैं हम
देखें! किसी के सामने खुल कर न आइए
अपना समझ के आपको समझा रहे हैं हम
झगड़ा हमारा 'इश्क़ से पहले भी ख़ूब था
मुँह लगने ना-मुराद के फिर जा रहे हैं हम
अशआर में समेट के गुलशन का रूप रंग
सारे जहाँ में 'इश्क़ को फैला रहे हैं हम
दिल में बिठा के रखना यही बात जान-ए-मन
पहले भी इक दफ़ा तेरी दुनिया रहे हैं हम
बुलबुल ने शाख़-ए-दिल पे बनाया है एक घर
ग़ज़लों से उस मकान को महका रहे हैं हम
'सोहिल' हमारे काम से कुछ लोग ख़ुश न थे
अब आ के इस मक़ाम पे इतरा रहे हैं हम
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