Maher painter 'Musavvir'

Maher painter 'Musavvir'

@Musavvir

Maher painter 'Musavvir' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Maher painter 'Musavvir''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कम से कम माँगने वालों को यहाँ कम से कम भी नहीं मिलने वाला — Maher painter 'Musavvir'
जो घाव तू ने दिया है अज़ीज़ है हम को जो उस पे बाँध रखा है रुमाल भी प्यारा — Maher painter 'Musavvir'
आज सबने यही बस सुनाया हमें आप पैदा हुए आप का शुक्रिया — Maher painter 'Musavvir'
गुलाब तोड़ के मेरी चमन में साँझ हुई तिरे फ़िराक़ में गुलशन की गोद बाँझ हुई — Maher painter 'Musavvir'
बहाने मिलने के शायद न रोज़ रोज़ मिलें किताब माँग लिया कर कभी कभी उस सेे — Maher painter 'Musavvir'
सुनाना चाहता हूँ चुटकुले हमशक्ल को अपने मुझे इक बार ख़ुद को मुस्कुराते देखना है बस — Maher painter 'Musavvir'
ज़ोर से बोलूँगा तो शैतान सुन लेगा मुझे और अगर चीखूँ नहीं तो वो सुनेगा किस तरह — Maher painter 'Musavvir'
चाँद, तारे, फूल, तितली ये सब इनको क्यूँ कहें औरतों को औरतों की तरह भी देखो कभी! — Maher painter 'Musavvir'
है गुहर हाथों में उस के साँस लेकिन रुक गई इक गुहर के वास्ते दूजी गुहर खोनी पड़ी — Maher painter 'Musavvir'
प्यादों के रंग अलग है मगर जाएँगे सभी शतरंज ख़त्म होने पे बक्से में एक ही — Maher painter 'Musavvir'
सभी करिश्में नज़र न आएंँगे आँख से ही मिसाल के तौर पर ख़ुदा को ही देख लो तुम — Maher painter 'Musavvir'

Ghazal

जान पहचान किसी से भी बनाएँ हम क्यूँ चार लोगों का भला बोझ बढ़ाएंँ हम क्यूँ बात लफ़्ज़ों में कभी तुम भी समझ लेना अब बात सारी ही इशारों में बताएंँ हम क्यूँ ये तमीज़ आप को थोड़ी बहुत आती होगी आप को सामने से रोज़ बलाएँ हम क्यूँ फ़र्क पड़ता नहीं फूलों को तिरे आने से बाग़ में ऐसे गुलों को फिर उगाएंँ हम क्यूँ क़ाबिल ए दार हमारे भी अलावा हैं बहुत सिर्फ़ ख़ुद को ही गुनहगार गिनाएंँ हम क्यूँ है ज़बान आप के मुँह में भी तो कुछ बोलो ना हर दफ़ा आप की आवाज़ उठाएँ हम क्यूँ और भी रंज हैं और दर्द ज़माने में भरे बस मुहब्बत की ही ग़ज़लों को सुनाएँ हम क्यूँ — Maher painter 'Musavvir'
महफ़िल में जब ग़ज़लें मेरी होती है ख़ुस-फ़ुस ख़ुस-फ़ुस बातें तेरी होती है इतना नशा है उस की दोनो आँखों में उस काजल की हेरा-फेरी होती है चूमना उस को काम हो जैसे सरकारी सरकारी कामों में देरी होती है छोड़ के फूलों को अब हर इक तितली भी बस उस के चहरे पे ठहरी होती है और सभी के साथ फ़कत गप्पे मारे तेरे साथ ही बातें गहरी होती है चूमा उस का माथा मैं ने भी ऐसे जैसे केक के ऊपर चेरी होती है मानो सूरज को बादल ने घेरा हो जब चेहरे पे ज़ुल्फ़ बिखेरी होती हैं डिज़्नी की परियों जैसा है प्यार अपना और लड़ाई टॉम एंड जेरी होती है — Maher painter 'Musavvir'