मुझे कभी भी मुहब्बत समझ नहीं आई
पर उससे ज़्यादा तो नफ़रत समझ नहीं आई
नशीन तख़्त पे हो, मुफ़्लिसों से तेवर हैं
मुझे तुम्हारी सियासत समझ नहीं आई
गुनाहगार नहीं, आम लोग क़ैद में है
भला ये कैसी हिफ़ाज़त, समझ नहीं आई
गुलों के साथ ये पानी पिलाए कांँटो को
ये बाग़बां की शराफ़त समझ नहीं आई
तुम्हे ये ख्वाब हमारा समझ नहीं आया
हमें तुम्हारी हकीक़त समझ नहीं आई
रगों से मर्द की औरत हर एक वाकिफ़ है
किसी भी मर्द को औरत समझ नहीं आई
वो शख़्स जिसको मुहब्बत हुई न हो तुम से
उसे ख़ुदा की करामत समझ नहीं आई
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