इस ओर का तो दौर ए ज़माना ख़राब है
उस ओर का भी यार नज़ारा ख़राब है
मय भी बहुत ख़राब है पर क्या करें बता
तेरी निगाह ए मस्त ज़ियादा ख़राब है
देखा मुझे मगर कोई दूजा ही मर गया
क़ातिल नज़र है तेरी, निशाना ख़राब है
मंज़िल नहीं मिली तो फिर इलज़ाम डाल दो
चलने का तौर ठीक है रस्ता ख़राब है
दुनिया उसी ने ही तो बनाई है बेवकूफ़
जिस को बता रहा है कि दुनिया ख़राब है
— Maher painter 'Musavvir'















