mehfil men jab ghazlein meri hoti hai | महफ़िल में जब ग़ज़लें मेरी होती है

  - Maher painter 'Musavvir'

महफ़िल में जब ग़ज़लें मेरी होती है
ख़ुस-फ़ुस ख़ुस-फ़ुस बातें तेरी होती है

इतना नशा है उसकी दोनो आँखों में
उस काजल की हेरा-फेरी होती है

चूमना उसको काम हो जैसे सरकारी
सरकारी कामों में देरी होती है

छोड़ के फूलों को अब हर इक तितली भी
बस उसके चहरे पे ठहरी होती है

और सभी के साथ फ़कत गप्पे मारे
तेरे साथ ही बातें गहरी होती है

चूमा उसका माथा मैंने भी ऐसे
जैसे केक के ऊपर चेरी होती है

मानो सूरज को बादल ने घेरा हो
जब चेहरे पे ज़ुल्फ़ बिखेरी होती हैं

डिज़्नी की परियों जैसा है प्यार अपना
और लड़ाई टॉम एंड जेरी होती है

  - Maher painter 'Musavvir'

Phool Shayari

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