अब रात हो गई चलो पैकर समेट लो

अब सुब्ह हो गई चलो बिस्तर समेट लो

ये क्या ज़रा ज़रा सा मज़ा ले रहे हैं आप
गर इश्क़ है तो बाँहों में यकसर समेट लो

ये रंज ओ ग़म हमारे लिए कुछ नए नहीं
आँखों में आप अपना समुंदर समेट लो

किस ने कहा कि प्यार की बाँहें नहीं बड़ी
फैलाओ बाँहें और ये अंबर समेट लो

पक्के मकान बच गए कच्चे जले मगर,
सरकार आप आग में हर घर समेट लो

कब तक यूँ शा'इरी में ही उलझे रहोगे तुम
अब तो मुसव्विर आप ये दफ़्तर समेट लो

— Maher painter 'Musavvir'

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