ज़ब्त की हद हो गई है और मैं ख़ामोश हूँ
जान निकली जा रही है और मैं ख़ामोश हूँ
सोचता था रू-ब-रू जब आप हों तो कुछ कहूँ
सामने मंज़र वही है और मैं ख़ामोश हूँ
मैं अकेला इस क़दर था यूँँ समझ लो मुझ को आज
हर नज़र अब देखती है और मैं ख़ामोश हूँ
जो कमी मेरी थी मैं ख़ामोश था उस पर मगर
ये कमी तो आप की है और मैं ख़ामोश हूँ
अपनी मंज़िल की तरफ़ मैं बढ़ रहा हूँ इसलिए
सब से बेहतर ख़ामुशी है और मैं ख़ामोश हूँ
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