सफ़्हों की क़ैदस अभी आज़ाद कीजिए
कुछ शेर-ए-तर हुए हों तो इरशाद कीजिए
शीशे से रोज़ आती है बस एक ही सदा
रोती हुई ये शक्ल कभी शाद कीजिए
सीने से दिल निकल के ही आ जाए रू-ब-रू
इक रोज़ इतना आप मुझे याद कीजिए
बस एक काम आता है दुनिया को ख़ूब-तर
जो शख़्स ख़ुश दिखाई दे नाशाद कीजिए
ये दिन ख़ुशी का दिन है इसे छोड़कर हुज़ूर
आबाद दिल को फिर कभी बर्बाद कीजिए
सोहिल ये अश्क आँख में क्यूँँ रोक कर रखे
आज़ाद पंछियों को तो आज़ाद कीजिए
Read Full