'उम्र भर यूँँ ही जलते रहे रौशनी भी नहीं कर सके
गाँव करना था रौशन हमें इक गली भी नहीं कर सके
हम को इतना डराया गया मेरे मौला तेरे नाम से
तेरे बंदे कभी ठीक से बंदगी भी नहीं कर सके
बेख़ुदी में उठे थे क़दम आ फँसे ऐसे रस्ते पे हम
मंज़िलें भी नहीं मिल सकी वापसी भी नहीं कर सके
छोटे घर के बड़े थे सो हम ज़िम्मेदारी निभाते रहे
आशिक़ी तो बड़ी बात थी ख़ुदकुशी भी नहीं कर सके
काम दो ही थे करने हमें आशिक़ी या तो फिर शायरी
आशिक़ी भी नहीं कर सके शायरी भी नहीं कर सके
Read Full