उस के कपड़े निकल रहे अलमारी से
जिस को था परहेज़ हमारी यारी से
दुनिया से जब जब उकताए इश्क़ किया
कुछ करना तो बेहतर है बेकारी से
दरगाहों पर चढ़ने हैं या मंदिर में
फूल कहाँ खिलते हैं इस तैयारी से
हम दोनों का रिश्ता बिल्कुल ऐसा था
जैसे पेड़ का रब्त रहा है आरी से
छोटे छोटे क़दमों को कम मत समझो
आग हमेशा लगती है चिंगारी से
उस से पूछो मयख़ाने की लज़्ज़त को
जिस ने सब कुछ लुटा दिया मयख़्वारी से
— Vikas Sahaj















