Ahmad Khayal

Top 10 of Ahmad Khayal

    जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती
    राह इस सम्त की हमवार नहीं भी होती

    मैं तही-दस्त लड़ाई के हुनर सीखता हूँ
    कभी इस हाथ में तलवार नहीं भी होती

    फिर भी हम लोग थे रस्मों में अक़ीदों में जुदा
    गर यहाँ बीच में दीवार नहीं भी होती

    वो मिरी ज़ात से इनकार किए रखता है
    गर कभी सूरत-ए-इंकार नहीं भी होती

    जिस को बेकार समझ कर किसी कोने में रखें
    ऐसा होता है कि बेकार नहीं भी होती

    दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल'
    सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती
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    तअ'स्सुब ज़दा दुनिया तिरे किरदार पे ख़ाक
    बुग़्ज़ की गर्द में लपटे हुए मेआ'र पे ख़ाक

    एक अर्से से मरी ज़ात में आबाद है दश्त
    एक अर्से से पड़ी है दर-ओ-दीवार पे ख़ाक

    वो ग़ज़ालों से अभी सीख के रम लौटा है
    बाल हैं धूल में गुम और लब-ओ-रुख़्सार पे ख़ाक

    मुझे पलकों से सफ़ाई की सआदत हो नसीब
    डाल कर जाए हुआ रोज़ दर-ए-यार पे ख़ाक

    एक ख़ुत्बा जो दिया हज़रत-ए-ज़ैनब ने 'ख़याल'
    आज तक डाल रहा है किसी दरबार पे ख़ाक
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    9
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    उसे इक अजनबी खिड़की से झाँका
    ज़माने को नई खिड़की से झाँका

    वो पूरा चाँद था लेकिन हमेशा
    गली में अध-खुली खिड़की से झाँका

    में पहली मर्तबा नश्शे में आया
    कोई जब दूसरी खिड़की से झाँका

    अमर होने की ख़्वाहिश मर गई थी
    जब इस ने दाइमी खिड़की से झाँका

    में सब्ज़े पर चला था नंगे पाँव
    सहर दम शबनमी खिड़की से झाँका

    मुझे भाते हैं लम्हे इख़तितामी
    में पहले आख़िरी खिड़की से झाँका
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    8
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    मैं वहशत-ओ-जुनूँ में तमाशा नहीं बना
    सहरा मिरे वजूद का हिस्सा नहीं बना

    इस बार कूज़ा-गर की तवज्जोह थी और सम्त
    वर्ना हमारी ख़ाक से क्या क्या नहीं बना

    सोई हुई अना मिरे आड़े रही सदा
    कोशिश के बावजूद भी कासा नहीं बना

    ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या
    जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना

    वर्ना हम ऐसे लोग कहाँ ठहरते यहाँ
    हम से फ़लक की सम्त का ज़ीना नहीं बना

    जितने कमाल-रंग थे सारे लिए गए
    फिर भी तिरे जमाल का नक़्शा नहीं बना

    रोका गया है वक़्त से पहले ही मेरा चाक
    मुझ को ये लग रहा है मैं पूरा नहीं बना
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    सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए
    कभी-कभार ख़ुद से भी कलाम करना चाहिए

    अदब में झुकना चाहिए सलाम करना चाहिए
    ख़िरद तुझे जुनून को इमाम करना चाहिए

    उलझ गए हैं सारे तार अब मिरे ख़ुदा तुझे
    तवील दास्ताँ का इख़्तिताम करना चाहिए

    तमाम लोग नफ़रतों के ज़हर में बुझे हुए
    मोहब्बतों के सिलसिलों को आम करना चाहिए

    मिरे लहू तू चश्म और अश्क से गुरेज़ कर
    तुझे रगों के दरमियाँ ख़िराम करना चाहिए
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    6
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    फ़ना के दश्त में कब का उतर गया था मैं
    तुम्हारा साथ न होता तो मर गया था मैं

    किसी के दस्त-ए-हुनर ने मुझे समेट लिया
    वगरना पात की सूरत बिखर गया था मैं

    वो ख़ुश-जमाल चमन से गुज़र के आया तो
    महक उठे थे गुलाब और निखर गया था मैं

    कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर
    किसी के हिज्र में रो रो के भर गया था मैं
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    Ahmad Khayal
    5
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    ये तअल्लुक़ तिरी पहचान बना सकता था
    तू मिरे साथ बहुत नाम कमा सकता था

    ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
    उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था

    मैं ने बाज़ार में इक बार ज़िया बाँटी थी
    मेरा किरदार मिरे हाथ कटा सकता था

    कुछ मसाइल मुझे घर रोक रहे हैं वर्ना
    मैं भी मजनूँ की तरह ख़ाक उड़ा सकता था

    अब तो तिनका मुझे शहतीर से भारी है 'ख़याल'
    मैं किसी वक़्त बहुत बोझ उठा सकता था
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    Ahmad Khayal
    4
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    जिस समय तेरा असर था मुझ में
    बात करने का हुनर था मुझ में

    सुब्ह होते ही सभी ने देखा
    कोई ता हद्द-ए-नज़र था मुझ में

    माँ बताती है कि बचपन के समय
    किसी आसेब का डर था मुझ में

    जो भी आया कभी वापस न गया
    ऐसी चाहत का भँवर था मुझ में

    मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद'
    और सदियों का सफ़र था मुझ में
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    Ahmad Khayal
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    ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
    उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था
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