jaisi honi ho vo raftaar nahin bhi hoti | जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती

  - Ahmad Khayal

जैसी होनी हो वो रफ़्तार नहीं भी होती
राह इस सम्त की हमवार नहीं भी होती

मैं तही-दस्त लड़ाई के हुनर सीखता हूँ
कभी इस हाथ में तलवार नहीं भी होती

फिर भी हम लोग थे रस्मों में अक़ीदों में जुदा
गर यहाँ बीच में दीवार नहीं भी होती

वो मिरी ज़ात से इंकार किए रखता है
गर कभी सूरत-ए-इंकार नहीं भी होती

जिस को बेकार समझ कर किसी कोने में रखें
ऐसा होता है कि बेकार नहीं भी होती

दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल'
सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती

  - Ahmad Khayal

Raasta Shayari

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