Jaleel 'Aali'

Jaleel 'Aali'

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Jaleel 'Aali' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaleel 'Aali''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं — Jaleel 'Aali'
दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से — Jaleel 'Aali'
रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है — Jaleel 'Aali'

Ghazal

सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ हिसार-ए-ज़ात से बाहर निकल पाओ तो आओ ज़मानों से फ़क़त लहरें गुमानों की गिनो हो किसी दिन तुम ये दरिया पार कर जाओ तो आओ हद-ए-ख़्वाहिश में जीना है तो जाओ राह अपनी न दश्त-ए-शौक़ की वुसअत से घबराओ तो आओ अजब बे-इख़्तियाराना थी हर आमद तुम्हारी इसी मौज-ए-मोहब्बत में कभी आओ तो आओ ये दरवेशों की दुनिया है करिश्में इस के देखो जहाँ से ही नहीं ख़ुद से भी उक्ताओ तो आओ रिफ़ाक़त अहल-ए-ग़म की इक नशात-ए-मुख़्तलिफ़ है जो रखते हो जिगर में दर्द का घाव तो आओ हमें इस हिकमत-ए-दौराँ का इक नुक्ता बहुत है अगर धुन है उलट दें वक़्त के दाओ तो आओ — Jaleel 'Aali'
ये शब ओ रोज़ जो इक बे-कली रक्खी हुई है जाने किस हुस्न की दीवानगी रक्खी हुई है वो जो इक मौज-ऐ-मोहब्बत तिरे रुख़ पर झलकी आँख में आज भी उस की नमी रक्खी हुई है वक़्त देता है जो पहचान तो ये देखता है किस ने किस दर्द में दिल की ख़ुशी रक्खी हुई है आती रहती हैं अजब अक्स ओ सदा की लहरें मेरे हिस्से की कहीं शा'इरी रक्खी हुई है दश्त की चुप से उभरती हैं सदाएँ क्या क्या बहर के शोर में क्या ख़ामुशी रक्खी हुई है कोई धुन है पस-ए-इज़हार सफ़र में जिस ने मेरी ग़ज़लों की फ़ज़ा और सी रक्खी हुई है कम कहा और सुझाया है ज़्यादा 'आली' एक इक सत्र में इक अन-कही रक्खी हुई है — Jaleel 'Aali'
मोड़ मोड़ घबराया गाम गाम दहला मैं जाने किन ख़राबों के रास्तों पे निकला मैं सत्ह-ए-आब कह पाए क्या तहों के अफ़्साने सामे-ए-लब-ए-साहिल बहरस भी गहरा मैं और कुछ तक़ाज़े का सिलसिला चले यारो पल में कैसे मन जाऊँ मुद्दतों का रूठा मैं वो कि है मिरा अपना हर्फ़-ए-मुद्दआ' उस को ग़ैर के हवाले से किस तरह समझता मैं जाने जज़्ब हो जाऊँ कब फ़ज़ा के आँचल में साअ'तों की आँखों से अश्क बन के ढलका मैं एक रोज़ तो गिरतीं फ़ासलों की दीवारें एक रोज़ तो अपने साथ साथ चलता मैं कौन है मिरा क़ातिल किस का नाम लूँ 'आली' अपनी ही वफ़ाओं के पानियों में डूबा मैं — Jaleel 'Aali'
लुटते हैं बहुत सहल कि दिन ऐसे कड़े हैं घर में नहीं जैसे कहीं जंगल में पड़े हैं सर साँझ के कब हैं फ़क़त इक शोर-ए-अना है चाहत के क़बीले नहीं ख़्वाहिश के धड़े हैं किस रंग से तुम संग ज़माने के चले हो हर नंग में नश्शे तुम्हें कुछ और चढ़े हैं दिन रात हैं बे-महर हवाओं के हवाले पत्तों की तरह जैसे दरख़्तों से झड़े हैं दुनिया तो है दुनिया कि वो दुश्मन है सदा की सौ बार तिरे इश्क़ में हम ख़ुद से लड़े हैं यलग़ार करूँँ क्या मिरे पिंदार के परचम रस्ते में पहाड़ों की तरह आन खड़े हैं इतने भी तही-दस्त तअल्लुक़ नहीं 'आली' इस शहर में कुछ अपने भी मशरब के थड़े हैं — Jaleel 'Aali'