थे निगाहों में जिन रास्तों के शजर और थे
दिल-मुसाफ़िर को दर-पेश थे जो सफ़र और थे
बस रहा था मिरी सोच के आसमानों पे जो
और ही शहर था उस के सब बाम-ओ-दर और थे
वो जो चेहरों पे लिक्खा हुआ ख़ौफ़ था और था
वो जो सपनों के अंदर पनपते थे डर और थे
सब जबीनें वहाँ थीं ज़मीं-बोसियों में मगन
कट के कुछ और ऊपर उठे थे जो सर और थे
शौक़ तुग़्यानियों में भी सँभाले रहीं धड़कनें
डूब कर जिन में उभरा न दिल वो भँवर और थे
उन ज़मानों भी अपने क़लम की ज़बाँ थी यही
लफ़्ज़ जब शहर-ए-तहरीर में मो'तबर और थे
— Jaleel 'Aali'















