masafaten kab gumaan men theen safar se aage | मसाफ़तें कब गुमान में थीं सफ़र से आगे

  - Jaleel 'Aali'

मसाफ़तें कब गुमान में थीं सफ़र से आगे
निकल गए अपनी धुन में उस के नगर से आगे

शजर से इक 'उम्र की रिफ़ाक़त के सिलसिले हैं
निगाह अब देखती है बर्ग ओ समर से आगे

ये दिल शब ओ रोज़ उस की गलियों में घूमता है
वो शहर जो बस रहा है दश्त-ए-नज़र से आगे

ख़जिल ख़यालों की भीड़ हैरत से तक रही है
गुज़र गया रह-रव-ए-तमन्ना किधर से आगे

तिलिस्म-ए-अक्स-ओ-सदास निकले तो दिल ने जाना
ये हर्फ़ कुछ कह रहे हैं अर्ज़-ए-हुनर से आगे

निसार उन साअतों पे सदियों के सहर 'आली'
जिए हैं जिन के जिलो में शाम ओ सहरस आगे

  - Jaleel 'Aali'

Dosti Shayari

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