ik aisi an-kahi tahreer karne ja raha hooñ | इक ऐसी अन-कही तहरीर करने जा रहा हूँ

  - Jaleel 'Aali'

इक ऐसी अन-कही तहरीर करने जा रहा हूँ
हुनर को और भी गम्भीर करने जा रहा हूँ

मिरे एहसास में बेचैन जिस के ख़ाल-ओ-ख़द हैं
उसे हर आँख में तस्वीर करने जा रहा हूँ

मैं फ़रहाद-ए-मआनी तेशा-ए-हर्फ़-ओ-बयाँ से
सुख़न की झील जू-ए-शीर करने जा रहा हूँ

दिलों के दरमियाँ रस्तों में कितने ख़म पड़े हैं
मैं उन को फिर से सीधा तीर करने जा रहा हूँ

वो जिस में बे-नवाओं के लहू की सुर्ख़ियाँ हैं
कुलाह-ए-शाह लीर-ओ-लीर करने जा रहा हूँ

मुझे ज़ंजीरना है अपने हिस्से का ज़माना
सो अपने आप को तस्ख़ीर करने जा रहा हूँ

सदा ताबीर-दर-ताबीर जो रक्खे सफ़र में
मैं वो ख़्वाब-ए-दिगर तामीर करने जा रहा हूँ

  - Jaleel 'Aali'

Ghamand Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Jaleel 'Aali'

As you were reading Shayari by Jaleel 'Aali'

Similar Writers

our suggestion based on Jaleel 'Aali'

Similar Moods

As you were reading Ghamand Shayari Shayari