dil aabaad kahaan rah paaye us ki yaad bhula dene se | दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

  - Jaleel 'Aali'

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

  - Jaleel 'Aali'

Yaad Shayari

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    अब सुलगती है हथेली तो ख़याल आता है
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    Faiz Ahmad

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As you were reading Shayari by Jaleel 'Aali'

    गुज़र गया जो मिरे दिल पे सानेहा बन कर
    उतर गया वो मिरी रूह में ख़ुदा बन कर

    तिरा ख़याल शब-ए-हिज्र फैलता ही गया
    हज़ार रंग की सोचों का सिलसिला बन कर

    वफ़ा के संग से टकरा के एहतिजाज-ए-अना
    सलीब-ए-लब पे सिसकने लगा दुआ बन कर

    बदन के दश्त में मन की हसीन सुब्हों को
    निकल रहा है ग़म-ए-दहर अज़दहा बन कर

    कभी तो दीप जलें गुल खिलें फ़ज़ा महके
    कभी तो आ शब-ए-वीराँ में रतजगा बन कर

    तमाम उम्र जिसे ढूँडते रहे 'आ'ली'
    कहीं मिला भी अगर वो तो फ़ासला बन कर
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    Jaleel 'Aali'
    जुदा जुदा सब के ख़्वाब ताबीर एक जैसी
    हमें अज़ल से मिली है तक़दीर एक जैसी

    हर इक किताब-ए-अमल के उनवान अपने अपने
    वरक़ वरक़ पर क़ज़ा की तहरीर एक जैसी

    गुज़रते लम्हों से नक़्श क्या अपने अपने पूछें
    इन आइनों में हर एक तस्वीर एक जैसी

    तिरी शररबारियों मिरी ख़ाकसारियों की
    हवा कभी तो करेगी तश्हीर एक जैसी

    ये तय हुआ एक बार सब आज़मा के देखें
    नजात-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र की तदबीर एक जैसी

    दिलों के ज़मज़म से धुल के निकली हुई सदाएँ
    समाअतों में जगाएँ तासीर एक जैसी
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    Jaleel 'Aali'
    सबील-ए-सज्दा-ए-ना-मुख़्ततम बनाते हुए
    ख़ुदा तक आए हैं क्या क्या सनम बनाते हुए

    ग़ुरूर-ए-इश्क़ में इक इंकिसार-ए-फ़क़्र भी है
    ख़मीदा-सर हैं वफ़ा को अलम बनाते हुए

    तिरे ख़याल की रौ है कि कोई मौज-ए-तरब
    गुज़र रही है अजब ज़ेर-ओ-बम बनाते हुए

    जबीन-ए-वक़्त पे सब्त अपना नक़्श उस ने किया
    दिलों के दाग़ चराग़-ए-हरम बनाते हुए

    तो क्या ज़रूर कि तहक़ीर ख़ल्क़ करते फिरो
    इक अपना अक्स-ए-अना मुहतशम बनाते हुए

    गुज़ारते हैं कहाँ ज़िंदगी गुज़रती है
    बस एक राह ब-सू-ए-अदम बनाते हुए
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    Jaleel 'Aali'
    ये जो अल्फ़ाज़ को महकार बनाया हुआ है
    एक गुल का ये सब असरार बनाया हुआ है

    सोच को सूझ कहाँ है कि जो कुछ कह पाए
    दिल ने क्या क्या पस-ए-दीवार बनाया हुआ है

    पैर जाते हैं ये दरिया-ए-शब-ओ-रोज़ अक्सर
    बाग़ इक सैर को उस पार बनाया हुआ है

    शौक़-ए-दहलीज़ पे बे-ताब खड़ा है कब से
    दर्द गूँधे हुए हैं हार बनाया हुआ है

    ये तो अपनों ही के चर्कों की सुलग है वर्ना
    दिल ने हर आग को गुलज़ार बनाया हुआ है

    तोड़ना है जो तअल्लुक़ तो तज़ब्ज़ुब कैसा
    शाख़-ए-एहसास पे क्या बार बनाया हुआ है

    जाँ खपाते हैं ग़म-ए-इश्क़ में ख़ुश ख़ुश 'आली'
    कैसी लज़्ज़त का ये आज़ार बनाया हुआ है
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    Jaleel 'Aali'
    रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है
    सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
    Jaleel 'Aali'
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