raasta sochte rahne se kidhar banta hai | रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है

  - Jaleel 'Aali'

रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है
सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है

  - Jaleel 'Aali'

Dar Shayari

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    रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
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    अपने होने से भी इंकार किए जाते हैं
    हम कि रस्ता तिरा हमवार किए जाते हैं

    रोज़ अब शहर में सजते हैं तिजारत मेले
    लोग सेहनों को भी बाज़ार किए जाते हैं

    डालते हैं वो जो कश्कोल में साँसें गिन कर
    कल के सपने भी गिरफ़्तार किए जाते हैं

    किस को मालूम यहाँ असल कहानी हम तो
    दरमियाँ का कोई किरदार किए जाते हैं

    दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे
    लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं

    मेरे दुश्मन को ज़रूरत नहीं कुछ करने की
    उस से अच्छा तो मिरे यार किए जाते हैं
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    Jaleel 'Aali'
    कुछ और मिरे दर्द के शो'लों को हवा दो
    बे-नूर हुए दाग़ अँधेरा है ज़िया दो

    पीछे ग़म-ओ-अंदोह के फ़िरऔन का लश्कर
    आगे अलम-ओ-यास का दरिया है असा दो

    मैं दश्त-ए-ग़म-ए-इश्क़ में हँसता हुआ आऊँ
    रस्ते से ग़म-ए-दहर की दीवार हटा दो

    मैं और सुलगता हुआ सहरा-ए-तजस्सुस
    भटका हुआ राही हूँ कोई राह दिखा दो

    क्यूँ मेरी शिकस्तों को सहारा नहीं मिलता
    इंसान हूँ मुहताज ख़ुदा का हूँ ख़ुदा दो

    इस शहर में जीने की है अब एक ही सूरत
    एहसास के मंसूर को सूली पे चढ़ा दो

    इस दौर का सुक़रात हूँ सच बोल रहा हूँ
    क्या देर है क्यूँ चुप हो मुझे ज़हर पिला दो
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    Jaleel 'Aali'
    ग़ुरूर-ए-कोह के होते नियाज़-ए-काह रखते हैं
    तिरे हम-राह रहने को क़दम कोताह रखते हैं

    अंधेरों में भी गुम होती नहीं सम्त-ए-सफ़र अपनी
    निगाहों में फ़िरोज़ाँ इक शबीह-ए-माह रखते हैं

    ये दुनिया क्या हमें अपनी डगर पर ले के जाएगी
    हम अपने साथ भी मर्ज़ी की रस्म-ओ-राह रखते हैं

    वो दीवार-ए-अना की ओट किस किस आग जलता है
    दिल ओ दीदा को सब अहवाल से आगाह रखते हैं

    दर-ओ-बसत-ए-जहाँ में देखते हैं सक़्म कुछ 'आली'
    और अपनी सोच का इक नक़्शा-ए-इस्लाह रखते हैं
    Read Full
    Jaleel 'Aali'
    सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ
    हिसार-ए-ज़ात से बाहर निकल पाओ तो आओ

    ज़मानों से फ़क़त लहरें गुमानों की गिनो हो
    किसी दिन तुम ये दरिया पार कर जाओ तो आओ

    हद-ए-ख़्वाहिश में जीना है तो जाओ राह अपनी
    न दश्त-ए-शौक़ की वुसअत से घबराओ तो आओ

    अजब बे-इख़्तियाराना थी हर आमद तुम्हारी
    इसी मौज-ए-मोहब्बत में कभी आओ तो आओ

    ये दरवेशों की दुनिया है करिश्मे इस के देखो
    जहाँ से ही नहीं ख़ुद से भी उक्ताओ तो आओ

    रिफ़ाक़त अहल-ए-ग़म की इक नशात-ए-मुख़्तलिफ़ है
    जो रखते हो जिगर में दर्द का घाव तो आओ

    हमें इस हिकमत-ए-दौराँ का इक नुक्ता बहुत है
    अगर धुन है उलट दें वक़्त के दाओ तो आओ
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    Jaleel 'Aali'
    जब भी मौसम-ए-हुनर हर्फ़ ओ बयाँ ले जाए
    यूँ लगे जिस्म से जैसे कोई जाँ ले जाए

    हम कि हैं नक़्श सर-ए-रेग-ए-रवाँ क्या जाने
    कब कोई मौज-ए-हवा अपना निशाँ ले जाए

    एक आज़ादी कि ज़िंदानी-ए-ख़्वाहिश कर दे
    इक असीरी कि कराँ-ता-ब-कराँ ले जाए

    वहशत-ए-शौक़ मुक़द्दर थी सो बचते कब तक
    अब तो ये सैल-ए-बला-ख़ेज़ जहाँ ले जाए

    एक परछाईं के पीछे हैं अज़ल से 'आली'
    ये तआक़ुब हमें क्या जाने कहाँ ले जाए
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    Jaleel 'Aali'

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